पगड़ी

सिर पर सजे पगड़ी, लाज रखे तगड़ी, राजपुताने की शान या कहो हिन्दुस्तान का मान, जानिए पगड़ी की कथा।

राजस्थान की पाग,पगड़ी (साफा)-

राजस्थान में पुरूष पुरातन काल से ही सिर पर साफा, पगड़ी बांधते आ रहे हैं।
साफा सिर्फ एक सिर का पहनावा नहीं है।
“पाग” राजस्थानी भाषा का शब्द है, पगड़ी हिंदी
भाषा का और साफा उर्दू-अरबी भाषा का।
पगड़ी को देश के हर हिस्से की तरह यहां भी इज्जत के साथ जोड़ा जाता है।
क्योंकि ये सिर पर धारण की जाती है।
आज भी बाजार में किराए पर दुकान चाहिये तो,
उसके लिए दी जाने वाली अमानत राशि को पगड़ी के रूप में जाना जाता है।

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3 पगड़ी इज्जत का प्रतीक-

पगड़ी बांधने के  कारण-

राजस्थान में नौ माह लगभग गर्मी पड़ती है और तीन माह तेज गर्मी पड़ती है।
ऐसे में साफे की कई परतें सिर को लू के थपेड़ों और तेज धूप से बचाती हैं।
राजस्थान वीरों की भूमि भी रही है। यदा कदा यहां भूमि और आन के युद्ध से भी गुजरना पड़ता था।
ऐसे में आपात प्रहार से बचने में भी साफा रक्षा का काम किया करता था।
शादी के समय साफे का रंग- केसरिया या चूँदडी, मारवाड़ में राजघराने में पीठी के समय कांभा- साफा, राखी के दिन बहन मोठड़ा साफा लाती है।

भारतीय संस्कृति-

राजस्थान सम्पूर्ण राष्ट्र में अपनी संस्कृति तथा प्राकृतिक विविधता के लिए पहचाना जाता है।
राजस्थान के रीति- रिवाज, यहां की वेशभूषा तथा
भाषा सादगी के साथ-साथ अपनेपन का भी अहसास कराते है।
राजस्थान के लोग रंगीन कपड़े और आभूषणों के शौकीन होते हैं।
राजस्थान के समाज के कुछ वर्गों में से कई लोग पगड़ी पहनते हैं,
जिसे स्थानीय रूप से पेंचा, पाग या पगड़ी कहा जाता है।

पगड़ी इज्जत का प्रतीक-

राजस्थान में पाग को लेकर कई लोक व्यवहारिक कथानक प्रचलित हैं।
जैसे पाग-बदल भाई बन जाना यानि अगर आपको
जरा सहारा चाहिए हो तो किसी से प्रगाढ़ मित्रता कर लेनी चाहिये।
और अगर कोई नाराज है तो, पाग उतार के उनके चरणों में रख दीजिये, 
सामने वाले का क्रोध शांत और मन पसीज जायेगा।
पगड़ी राजस्थान के पहनावे का अभिन्न अंग है। बड़ो के सामने खुले सिर जाना अशुभ माना जाता है।

पगड़ी पहनने का तरीका-

यह लगभग 18 गज लंबे और 9 इंच चौड़े अच्छे रंग का कपड़े के दोनों सिरों पर व्यापक कढ़ाई की गई
एक पट्टी होती है, जिसे सलीके से सिर पर लपेट कर पहना जाता है।
पगड़ी सिर के चारों ओर विभिन्न व विशिष्ट शैलियों में बाँधी जाती है तथा ये शैलियां विभिन्न जातियों और विभिन्न अवसरों के अनुसार अलग-अलग होती है।

पगड़ी एक पहचान-

किसी व्यक्ति का समुदाय और जाति को उसकी
पगड़ी के रंग एवं उसे बाँधने की शैली से कुछ हद तक पहचाना जा सकता है-
जैसे विश्नोई हमेशा सफेद साफा बांधते हैं, राईका-रेबारी लाल टूल का साफा बांधते हैं,
तो लंगा-मांगणियार, कालबेलिया आदि रंगीन छापल डब्बीदार भांतवाले साफे बांधते हैं।
कलबी लोग सफेद, कुम्हार व माली लाल, व्यापारी वर्ग लाल, फूल गुलाबी, केसरिया,
जवाई इत्यादि रंग की पगड़ियां बांधते हैं।
रियासती समय में,पगड़ी को उसे पहनने वाले की
प्रतिष्ठा (आन) के रूप में माना जाता था।

सम्प्रदाय की पहचान-

सम्प्रदाय के अनुसार भी पगड़ियों के रंग विभिन्न होते हैं, जैसे- रामस्नेहियों का रंग सफेद, कबीर सम्प्रदाय का रंग लाल एवं पगड़ी मन्दिर के शिखर के समान आकार की बांधते हैं। नाई, जोगियों, गर्ग-स्वामियों, मठाधीशों एवं सन्यासियों की पगड़ी का रंग जोगिया या भगवा होता है। गर्ग भगवी पगड़ी पर काली डोरी बांधते हैं।

पगड़ी के प्रकार-

रियासत काल से लोग विभिन्न प्रकार की पगड़ियों जैसे लहरिया, सोना के किनारे वाली, लप्पेदार, कोर तुर्रा वाली, मौलिया चस्मई पीला, मौलिया पंचरंगी, मौलिया कसूमल सब्ज, कसूमल घोटेदार लहरदार, गंगा-जमुनी, पोतिया कसूमल, पोतिया किरमिची आदि।
इसके अलावा सोने-चांदी वाली चौकी, विलायती मलमल या चंदेरी पोत की पाग विवाह के अवसर पर पहनी जाती थी।
मारवाड़ी पाग या चोंचदार पाग ध्यानाकर्षण का केंद्र होती है।

शोक पर पगड़ी का रंग-

शोक के अवसर पर काले और सादे सफेद रंग की पगड़ी प्रयोग होती है।
हरे और नीले आदि का प्रयोग किसी भी उदासीन अवसर पर नहीं किया जाता है।
पगड़ियों में शोक के रंग अलग होते हैं – आसमानी, सफेद, खाकी, भूरा रंग, काला इत्यादि शोक के रंग माने जाते हैं।

विविध प्रकार की पगड़ियाँ-

14-20 मीटर पाग- लहरिया, मौलिया (बहुरंगी पोतिया) मोठड़ा और चूंदड़ी आदि
13-15 मीटर पाग-  इसे पगड़ी कहते हैं
पेंचा- ये अन्य प्रकार की पाग है जिसके एक सिरे पर गोल्डन जरी के झब्बों के साथ सजाया होता है।
साफा – ये पाग से छोटा किन्तु चौड़ा होता है। साफा इस प्रकार से बांधा जाता है कि इसके एक छोर पर कपड़ा सिर से पीठ पर कमर तक नीचे लटका होता है।

फेंटा-

ये सोने-चांदी के कलात्मक कार्य से सजा होता है।

पोतिया-

यह आम व्यक्ति द्वारा पहनी जाती है। पोतिया सामान्य तौर पर ही सिर पर लपेट कर पहना जाता है।पाग, पगड़ी, पेंचा और मादिल एक ही रंग के कपड़े की होती है और इनको एक तरफ से पूरी लंबाई में जरी की एक पट्टी से सजाया हुआ होता है।

पाग लम्बाई में बड़ी है तो, पगड़ी छोटी है।
लेकिन यदि रंगीन तथा अन्तिम छोर (छेला) जरी का बना हो तो पेंच कहलाती है।

पगड़ी के रंगों के प्रतीक-

गहरे रंग की पगड़ियों का प्रयोग सर्दियों के मौसम में किया जाता है क्योंकि गर्मी के मौसम में पसीने के कारण इनका रंग पसीने के साथ बहने लगेगा, अतः गर्मी के मौसम के लिए हल्के रंगों को चुना जाता है।

साहस का प्रतीक-

इस्तेमाल किए जाने वाले विभिन्न रंगों में कसूमल (लाल) और केसरिया  का मारवाड़ के सामाजिक रीति-रिवाजों में विशेष महत्त्व होता है।
केसरिया  रंग राजपूतों की बहादुरी, वीरता, बलिदान और साहस का प्रतीक था तथा यह युद्ध के दौरान पहना जाता था।

खुशी भी का प्रतीक-

रंग कसूमल (लाल) प्रेम और खुशी भी का प्रतीक था। यह शादी और त्योहारों के अवसर पर पहना जाता था।
केसरिया पाग भी बरसात के मौसम के दौरान पहनी जाती थी। जैसे ही यह पाग बरसात के पानी से गीली हो जाती थी तो केसर की खुशबू प्रदान करती थी क्योंकि इसे केसर के फूलों के साथ रंगा गया होता था।

शोक पर पगड़ी का रंग-

शोक के अवसर पर काले और सादे सफेद रंग की पगड़ी प्रयोग होती है।
हरे और नीले आदि का प्रयोग किसी भी उदासीन अवसर पर नहीं किया जाता है।
पगड़ियों में शोक के रंग अलग होते हैं – आसमानी, सफेद, खाकी, भूरा रंग, काला इत्यादि शोक के रंग माने जाते हैं।

किसी के पिता की मृत्यु पर 12वें दिन ज्येष्ठ पुत्र को पगड़ी बंधवाकर घर का उत्तराधिकारी घोषित किया जाता है  सफेद रंग की फागणिया पाग में दोनों सिरों पर लाल बंधेज होती है और पूरी पाग में लड्डू-भांत होती है। फागणिया पाग को मार्च महीने में फाल्गुन मास में होली के त्यौहार के दौरान पहना जाता है।

तयोहारों में  पगड़ी का रंग-

अक्षय तृतीया (आखा तीज) को राजस्थान में सबसे शुभ दिन माना जाता है। इस दिन पर एक केसरिया पाग पहनने की प्रथा है।

दीपावली के अवसर पर मोर गर्दनी पाग (मोर के गर्दन के रंग वाली पाग) को पहना जाता है।
  
विभिन्न त्यौहारों जैसे रक्षाबंधन आदि और शादी जैसे अवसरों पर मोठड़ा पाग को पहना जाता है।
जयपुर की लहरिया पगड़ी को राजशाही पगड़ी कहते हैं। पंचरंगी पाग या पेंचे का प्रयोग जयपुर राजघराने में अधिक था।

मेवार की पगड़ी-

मेवाड़ की पगड़ी चपटी, मारवाड़ की छज्जेदार, और जयपुर की खूंटेदार होती है।
पगड़ी बांधना एक कला है। जयपुर के आखिरी खास बंधेरा (पगड़ी बांधने वाला) सूरज बख्श को जागीर प्रदान की गई थी।

पगड़ी पर राजा लपेटा बांधते थे तथा इसमें गहने, कलंगी, चन्द्रमा, तुर्रा आदि लगाए जाते थे।
मेवाड़ महाराणा की पगड़ी बांधने वाला छाबदार कहलाता था। उसके पास पगड़ी के जेवर एवं अन्य संबंधित वस्तुएं होती थी।

पगड़ी का इतिहास-

पाग-पगड़ियों का उल्लेख बड़े विस्तार से कपड़ों के
कोठार बही में महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश में उपलब्ध है।
महाराजा मानसिंहजी के काल की विक्रम सं. 1879 की कपड़ों के कोठार की बही संख्या 28 एवं 14 में,

मुख्य “पाग”-

विभिन्न प्रकार के पागों की विगत मिलती है,
जिनमें मुख्य रूप से पाग चन्देरी, पाग वजवाड़ा,
पाग शाहगढ़, पाग चीररी, पाग सुफेद ढ़ाकारी-ओटे पले की, पाग बूसी की, पाग तासकी, पाग चिटलरी,
पोतीयो-गुजराती, पाग पूरझसार की चौकड़ी की,
पाग लफादार, पाग नागोरण, मोलीया अमरसाही अनार का, पोतीया शीफोन का, पाग बांधणु, पाग
दीरवश की, पंचा तास रुपेरी, पाग जुसीरी, पाग किरमची इत्यादि प्रकार की पागे विभिन्न परगनों से
आयात की जाती थीं।
इनमें नागोरण पाग, ढाका की मलमली पाग, दीलीकी सफेद पाग, वीरानपुरी पाग, विशनपुरी
पाग महाराजा विजयसिंहजी के शासनकाल वि. सं 1843 में प्रसिद्ध थी।

रियासत की बहियों का इतिहास-

पगड़ियों के मुख्य रंग रियासत की बहियों में पागों के विभिन्न रंगों का भी उल्लेख प्राप्त होता है,
जैसे-  कसूमल, कस्तूरिया, गुलनार, मोठड़ा, बूंटीदार, केरी भांत, तोरी-फूली, सिन्दूरिया, फागुणियां, सुआपंखी, अमरसिया, आभावरणी सोसनी, जवाई, फूल बुआड़ी, मलयागिरी, समदर लहर, राजाशाही, बीदामी, किरमची रंग की तथा छापल सुनहरी पागों का उल्लेख विभिन्न कपड़ों के कोठार की बहियों में मिलता है।

खिड़किया पाग – 

खिड़किया पाग का प्रचलन 17 वीं सदी तक था।
इसे शाही लोगों के साथ-साथ आम लोगों द्वारा पहना जाता था।
वर्तमान में इसे नहीं पहना जाता है। यद्यपि, पिछली दो शताब्दी से खिड़किया पाग का प्रयोग,
गणगौर के अवसर पर केवल इसरी महाराज के लिए किया जाता है।

“पाग” बनाने का प्रचीन तरीका-

पाग के लिए पहले पीतल या तांबे का एक साँचा तैयार किया जाता था।
इस साँचे पर, नरम सूती वस्त्र की परतों को जमाया जाता है और इसे सिलाई के साथ एक विशिष्ट आकार दिया जाता था।
इसके ऊपर बंधेज के कपड़े या खीमखाप और मोती आदि के साथ सजा कर इसे पहना जाता था।
जोधपुरी खिड़किया पाग का सामने का भाग ऊँचा तथा दूसरा पिछला भाग नीचा हुआ करता था।
जोधपुर के महाराजा तखत सिंह और उनके बेटे महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय-कभी कभी खिड़किया पाग पहनते थे।

कुछ पगड़ियों का प्रचलन खत्म-

लेकिन जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है
खिड़किया पाग का वर्तमान काल में प्रचलन नहीं है।
महाराजा अजीत सिंह के शासनकाल के दौरान शाही और कुलीन वर्ग के लोग खिड़किया पाग को प्रयुक्त करते थे।
सरदार लोग उनके साफे को सजाने के लिए जरी का प्रयोग किया करते थे।
एक सुनहरी कलंगी के साथ भी पगड़ी को सजाने का प्रचलन था।
विशेष अवसरों पर महाराजा उनकी पगड़ी पर एक कलंगी रखकर सरदारों का सम्मान किया करते थे।

तखतशाही पाग –

महाराजा तखत सिंह को महाराजा मान सिंह द्वारा गुजरात से गोद लिया गया था।
इसलिए उनकी पोशाक और साहित्यिक कृतियों में गुजराती प्रभाव देखा जा सकता है।
इसी कारण उनकी पगड़ी पर भी गुजराती प्रभाव था।
उनका पाग एक अजीब आकार की थी।
यह लम्बी, ट्यूबलर और ऊँची होती थी।
यह एक तरह से खिड़किया पाग के समान में बनी होती थी।
पाग को जरी के काम से अलंकृत किया होता था।
और इस पर एक सरपेच तथा मोती की कई लडियां एक तरफ जुडी होती थी।
एवं इसकी चोटी पर एक तुर्रा लगाया जाता था।

जसवंत शाही पाग – 

हालांकि महाराजा जसवंत सिंह विभिन्न तरह की खिड़किया पाग के पहनते थे,
किन्तु उनकी पाग तखतशाही से अलग थी।उन्होंने बंटदार या दोराग पाग को लोकप्रिय बनाया।
पाग को एक छोर पर बाईं आंख के ऊपर लपेटा जाता है यह पाग एक टोपी जैसी लगती थी।
पाग के एक छोर पर एक छोटे सी लटक छोड़ दी जाती थी।
जिसे वापस सिलकर ऊपर की तरफ कर दिया जाता था।
और पाग के लिए सिले किया गया था। यह पाग वर्ष 1893 के बाद लोकप्रिय हुई।

जालिम शाही या राठौड़ी पाग – 

महाराजा जालिम सिंह महाराजा तखत सिंह के पुत्र थे।
उन्होंने जसवंत शाही पाग को अपनाया और उसमें कुछ परिवर्तन किये।
तखतशाही पाग को दो भागों में विभाजित किया जाता था।
इसकी लंबाई को कम कर दिया,
तथा इसे और अधिक टोपीनुमा बना दिया।
पाग के एक छोर पर जरीदार पल्लू सिला होता था।
यह पाग एक तरह से खिड़किया पाग के समान बनाई जाती थी।

जोधपुरी साफा –

मारवाड़ में महाराजा अजीत सिंह-प्रथम से महाराजा मान सिंह जी (1843 ईस्वी) के शासनकाल से फेंटा भी प्रचलित था।
लेकिन कहा जा सकता है कि वर्तमान रूप में प्रचलित जोधपुरी साफा महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के शासनकाल से प्रचलित हुआ था।
इस साफे के आकार को महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की तस्वीरों में देखा जा सकता है।
यह साफा महाराजा सुमेर सिंह के द्वारा भी अपनाया गया था।

विजयशाही पाग – 

विजयशाही पाग महाराजा विजय सिंह के पश्चात लोकप्रिय हुई थी।
महाराजा विजय सिंह के शासनकाल के दौरान,
वहां कपडे़ की कोठार बही में पागों के कई संदर्भ उल्लेखित हैं।
ये इस प्रकार हैं- गुरु पाग, भोम पाग, सुकर पाग,
सोम पाग, पाग तासरी, सोनारी पाग सफेद, बुद्ध पाग, पाग कसूमल, पाग कसूमल बांधुन, पाग लाल
एकदानी, पाग जुमरादी और चिकरनी आदि। इनके अलावा चंदेरी, सेला, सहगढ़, मौलिया,
तंजेबरी, बड़ोलिया और आबसाई आदि के लिए संदर्भ आते हैं।
मेवाड़ की विशिष्ट पगड़ियां-
मेवाड़ की पगड़ी खिड़कीदार (कुलेदार) होती थी। यह पगड़ी कपड़े की इमली पर बांधी जाती थी। इसमें सिर को पूरा ढकने के लिए रुई का सीधा खग होता था।

उदयशाही पगड़ी-

इसे मध्यकाल में महाराणा उदय सिंह द्वारा किया जाता था। इस पगड़ी में खग एक तरफ रहता था, जिसमें जरी लगायी जाती थी।
इस पर तीन पछेवड़िया और चन्द्रमा बांधा जाता था।

अमरशाही पगड़ी-

महाराणा अमर सिंह द्वारा प्रयुक्त इस पगड़ी में पीछे एक पासा और बीच में जरी होती है।
इसके पीछे दो पछेवड़िया बाँधी जाति थी।
खग में किरण और मोतियों की लड़ लगायी जाती थी।

अरसीशाही पगड़ी-

महाराणा अरि सिंह (1761-73 ई.) के काल से अरसीशाही पगड़ी का चलन भी हो गया था।
इसमें खग तीखा और रूईदार होता था।
इसके अन्दर ओटों में रूई रहती थी।
इसमें तीन पछेवड़ी और अन्य जड़ाऊ जेवर होते थे।

भीमशाही पगड़ी-

महाराणा भीम सिंह (1778-1828 ई.) के काल से भीमशाही पगड़ी का बंधेज शुरू हो गया था।
इसमें खग मोटा और तोते की नाक की तरह निकला एक तरफ झुका होता था।
इसके सामने के ओटे बटदार और सुंदर होते थे।

स्वरुपशाही पगड़ी-

स्वरूपशाही पगड़ी का बंधेज महाराणा स्वरुप सिंह (1842-61 ई.) में शुरू हुआ था।
यह रूई की दो इमलियों पर बंधी जाती थी।
इसके खग और बीच के पासे में जरी लगती थी।
और आग्या खाली रहता था।

मेवाड़ के सामंतों की पगड़ियां –

सलूम्बर की चूंडावतशाही पगड़ी के बंधेज में कपड़े
की इमली तीन पासे, पासों तथा सर पर जरी और आग्या सामने होता था।
देवगढ़ की जसवंतशाही पगड़ी बिना इमली की होती थी।
इसमें केवल पगड़ी का खग निकाला जाता था।
कानोड़ की मांडपशाही पगड़ी में तीन पासे होते हैं जिनमे जरी लगाई जाती थी।
इसका आग्या बाजू पर रहता था। बदनोर की राठौड़ी पगड़ी में बंधेज बाएँ ओर होता था।
भैन्सरोड़गढ़ की मानशाही पगड़ी बटदार होती थी। इसमें इमली नहीं होती थी।
ठेठ तक गुम्बदनुमा आंठे चलते थे।
बनेड़ा की हमीरशाही पाग अरसीशाही पाग से मिलती जुलती थी।
इससे पूर्व यहाँ के रावले में खिड़कीदार पगड़ी पहनी जाती थी।  

मौसम की साथ रंग बदलती पगड़ी-

चैत्र मास की गुलाबी, वैशाख की ज्वार के रंग की, ज्येष्ठ में – गुलाबी रंग,
और आषाढ़ में आभा शाही, सावन में – लहरिया,
भादों में – मलयगिरि, आश्विन में – लाल या कसूमल ,
कार्तिक में – मोलिया, पौष में – हल्का केसरिया,
माघ महीने में – केसरिया और फिर फाल्गुन में फगुनिया पगड़ियां पहने लोग इतिहास में दर्ज हो गये।
रह गयीं वो सजीधजी बारातें, कुछ लवाजमें, कुछ रवायतें,
इतिहास कभी-कभी मानव के बदलते रंग-रूप पर इठलाने लगता है।

आधुनिक और ऐतिहासिक पगड़ी-

लोक भाषा,बोली में पाग पगड़ी को पोतीयो, साफो, फालियो, घूमालो, फेंटो, लपेटो जैसे नामों से भी जाना जाता है।
राजस्थान में पगड़ियां सूती, रेशमी, शीफोन, इत्यादि की बनाई जाती थीं।
आजकल पोलीएस्टर और सूती कपड़े की सिली हुई रेडीमेड पगड़ियां भी खूब मांग में हैं।
रजवाड़ों के समय में पाग-पगड़ियों के लिए मंगाए
कपड़े, उनकी सिलाई ,सजाने के लिए किये खर्च
का उल्लेख कपड़ों की बही में बड़े व्यापक रूप में मिलता है।
राजस्थान के  बीकानेर , जोधपुर , उदयपुर आदि,
शहरों के संग्रहालयों में ये बहियां आज भी सुरक्षित सजाई गई हैं।

भूली-बिसरी परंपराऐं-

ब्यस्तता को आनंद की चादर से ढंककर,
जीवन को रस से भर देने वाली ये परम्पराएं हम से दूर होती जा रही हैं।
पगड़ी का इतिहास आज भी हमारी संस्कृति,और सभ्यता को बयान करता है। जो पाश्चात्य सभ्यता से परे है।
राजस्थानी पगड़ी आज भी इसका जीवंत उदाहरण है।