राम का वनवास

जन्म लेकर राम का वनवास जाना धरती से पाप का बोझ कम करने हेतु बहाना था।
वह हर जीव के हृदय में ‘रमन’ (निवास) करते है,
इसलिए वह ‘राम’ हैं – “रामते केन इति रामः”। आदि शंकराचार्य ने ‘विष्णुसहस्रनाम’ पर अपने भाष्य में पद्म पुराण का उदाहरण देते हुए कहा है कि,
योगी परम भगवान में नित्यानंद के रूप में आनन्दित होते हैं, इसलिए वे ‘राम’ हैं।

राम का जन्म और वनवास:

राम भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं, और उन्हें श्री राम और श्री रामचंद्र के नाम से भी जाना जाता है।राम जी का वनवास ईश्वर का खेल था।
रामायण के वर्णन के अनुसार अयोध्या के राजा सूर्यवंशी चक्रवर्ती सम्राट दशरथ ने पुत्र की कामना से यज्ञ किया था।
जिससे उनके पुत्रों का जन्म हुआ। श्री राम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ की सबसे बड़ी रानी देवी कौशल्या के गर्भ से हुआ था।
श्री राम जी चार भाइयों में सबसे बड़े थे।
श्री राम जयंती या राम नवमी का पर्व हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है।

भगवान राम पर रचनाएँ:

श्री राम के जीवन और पराक्रम का वर्णन महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में किया गया है।
राम के जन्म से पहले ही वाल्मीकि ने रामायण महाकब्य के रूप में उनके जीवन चरित्र की कहानी का संग्रह किया था।
गोस्वामी तुलसीदास ने अपने जीवन पर केंद्रित भक्ति के प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस की भी रचना की है।
इन दोनों के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में भी रामायण की रचना की गई है, जो बहुत प्रसिद्ध भी हैं।

राम की ख्याति :

श्री राम भारत में बहुत पूजनीय हैं और एक आदर्श पुरुष हैं,
और दुनिया के कई देशों में श्री राम को एक आदर्श के रूप में भी पूजा जाता है।
थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि की तरह उन्हें भी पुरुषोत्तम शब्द से अलंकृत किया गया है। मर्यादा-पुरुषोत्तम राम अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र थे।

रावण का वध:

राम की पत्नी का नाम सीता था, उनके तीन भाई थे – लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। हनुमान को राम का सबसे बड़ा भक्त और दूत माना जाता है।
राम ने लंका के राजा रावण (जिसने अधर्म के मार्ग का अनुसरण किया था) का वध किया। श्री राम की मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठा है।
श्रीराम ने राज्य छोड़ दिया, दोस्तों, माता-पिता, यहां तक ​​कि पत्नी को भी गरिमा का पालन करना।
उनका परिवार आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है।

रामायण के एक प्रसंग में बताया गया है कि कैकेयी के आग्रह के कारण भगवान श्री राम को लक्ष्मण जी और माता सीता के साथ वन जाना पड़ा।
केवल कैकेयी ही श्रीराम के वनवास का कारण नहीं थी। कैकेयी के अलावा भी कुछ ऐसे कारण थे,
जिनकी वजह से श्री राम, देवी सीता और लक्ष्मण जी को 14 साल का वनवास भुगतना पड़ा था।

राम का वनवास ,कारण देवी सरस्वती :

हम सभी जानते हैं कि श्री राम ने रावण का वध करने के लिए धरती पर जन्म लिया था।
अगर कैकेयी ने राजा दशरथ को श्रीराम को वनवास के लिए राजी नहीं किया होता तो,
श्री राम अयोध्या के राजा बन जाते। जिससे न तो देवी सीता का हरण
होता और न ही रावण को मारने का उद्देश्य पूरा होता।

इसलिए देवताओं के अनुरोध पर देवी सरस्वती कैकेयी की दासी मंथरा का मन फेर देती हैं।
जिससे मंथरा आती हैं और कैकेयी के कान भरने लगती हैं कि अगर राम राजा बने तो कौशल्या का प्रभाव बढ़ जाएगा।
इसलिए भरत को राजा बनाने की जिद करनी चाहिए।

दो वचन :

कैकेयी के दिमाग को घुमाने के लिए मंथरा के शब्द ही काफी थे।राम का वनवास कैकेई के दिमाग मे बरने के लिये।
मंथरा की बात पर कैकेयी ने खुद को कोप भवन में बंद कर लिया।
जब राजा दशरथ कैकेयी को समझाने आए, तो कैकेयी ने भरत को राजा बनने के लिए और राम को चौदह वर्ष के वनवास ।

अपने उधार पड़े दोनो वचन मांग लिये।
इसी वचन के कारण श्री राम को अयोध्या छोड़कर वनवास जाना पड़ा।
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में राम का वनवास कथा वर्णित किया है कि,

होइहै वही जो राम रचि राखा।का करि तर्क बढ़ावहिं साखा ।।

अर्थात श्री राम की मर्जी के बिना कुछ नहीं होता। श्री राम परम विष्णु के अवतार थे, और वह सब कुछ जानते थे।
अपनी लीला को पूरा करने के लिए वह जंगल जाना चाहते थे क्योंकि उसे जंगल में हनुमान जी से मिलना था।
साबरी को बचाना था। धरती पर धर्म और मर्यादा की शिक्षा दी जानी थी।
इसलिए जन्म से पहले ही श्री राम ने निश्चय कर लिया था कि उन्हें वन में जाकर पृथ्वी से पाप का बोझ कम करना है।

राम का वनवास और भ्रमण स्थल :

रामायण में उल्लेख किया गया है और कई शोधकर्ताओं के अनुसार, जब भगवान राम को वनवास दिया गया था,
तब उन्होंने अयोध्या से रामेश्वरम और फिर श्रीलंका की यात्रा शुरू की थी।
इस दौरान उनके साथ जो भी हुआ उसमें से 200 से अधिक घटनाओं की पहचान की जा चुकी है।

प्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्वविद् डॉ. राम अवतार ने श्री राम और
सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े 200 से अधिक ऐसे स्थानों का पता लगाया है,
जहां आज भी उनसे जुड़े स्मारक मौजूद हैं, जहां श्री राम और सीता ठहरे थे।
स्मारकों, भित्ति-चित्रों, गुफाओं आदि की समयावधि की जांच वैज्ञानिक तरीकों से की गई थी।
आइए जानते हैं कुछ प्रमुख जगहों के नाम।

1.राम का वनवास तमसा नदी से प्रारंभ :

तमसा नदी अयोध्या से 20 किमी दूर है। यहां उन्होंने नाव से नदी पार की।यहीं से राम का वनवास प्रारंभ हुआ था।

2.राम का वनवास सेवक श्रंगवेरपुर तीर्थ में:

प्रयागराज से 20-22 किमी दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुहा का राज्य था।
यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने नाविक को गंगा पार करने के लिए कहा था।
श्रंगवेरपुर को वर्तमान में सिंगरौर कहा जाता है।

3.कुरई गांव :

सिंगरौर में गंगा पार करने के बाद श्री राम कुरई में रुके थे।

4.प्रयाग :

कुरई से आगे बढ़कर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी के साथ प्रयाग पहुंचे। प्रयाग का बदला हुआ नाम इलाहाबाद और वर्तमान प्रयागराज कहलाता है।
भगवान श्री राम ने प्रयाग संगम के पास यमुना नदी को पार किया, और फिर चित्रकूट पहुंचे।
राम ने अपना अधिकांश वनवास चित्रकूट में ही बिताया था। चित्रकूट वह स्थान है ,
जहाँ भरत राम को मनाने के लिए अपनी सेना के साथ पहुँचते हैं। फिर जब दशरथ की मृत्यु हो गई।
भारत राम का चरण पादुका लेकर और उनके पदचिन्हों को रख कर यहां से शासन करता है।

5.राम का वनवास स्थल चित्रकूट धाम :

भगवान श्री राम ने प्रयाग संगम के पास यमुना नदी को पार किया और फिर चित्रकूट पहुंचे।
राम ने अपना अधिकांश वनवास का समय(लगभग 12 वर्ष) चित्रकूट में ही बिताया था।
यहां पर रामघाट, भरत घाट, सीता रसोई आदि आज भी है। चित्रकूट वह स्थान है,
जहाँ भरत राम को मनाने के लिए अपनी सेना के साथ पहुँचे थे।
जब दशरथ की मृत्यु हो गई।
भरत राम की चरण पादुका लेकर अयोध्या गये और उनके पदचिन्हों को रख कर शासन करते थे।

6.शिवरामपुर :

शिवरामपुर चित्रकूट से मात्र 5 किमी की दूरी पर स्थित उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित एक छोटा सा गाँव है,
जिसे उस समय राम ने चित्रकूट द्वार का नाम दिया था।
जिसका नाम बाद में बदलकर शिवरामपुर कर दिया गया।
यहीं से होकर श्री राम भरत से मिलनें भरतकूप गये थे।

7.भरतकूप:

यह स्थान चित्रकूट से 10 किमी दूर है, जहां भगवान राम अपने भाई भरत से मिले थे।
और भरत ने यहां स्थित एक कुएं पर सभी तीर्थों का जल डाला था,
और भगवान राम ने इस स्थान का नाम भरतकूप रखा था।
तभी से आज तक यहां हर वर्ष विशाल मेला लगता है।

8.अनुसूया और अत्रि आश्रम:

चित्रकूट के पास सतना (मध्य प्रदेश) में स्थित अनुसूया, अत्रि ऋषि का आश्रम है।
यहीं पर माता अनुसूया ने माता सीता को दैविक गहने प्रदान किये थे।
अनुसुइया पति महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहते थे,
यह स्थान मध्य प्रदेश के सतना जिले में है।
लेकिन श्री राम भी सतना में ‘रामवन’ नामक स्थान पर कुछ दिन रहे, जहां ऋषि अत्री का एक और आश्रम था।

9.राम का वनवास और दंडकारण्य भ्रमण,

दंडकारण्य छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों का हिस्सा था। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के अधिकांश राज्य शामिल हैं।
दरअसल, दंडकारण्य का क्षेत्र उड़ीसा के महानदी के इस दर्रे से गोदावरी तक फैला हुआ था।
इस दंडकारण्य का एक हिस्सा आंध्र प्रदेश का एक शहर भद्राचलम है।
गोदावरी नदी के तट पर स्थित यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।
यह मंदिर भद्रगिरी पर्वत पर है। कहा जाता है कि वनवास के दौरान श्री राम ने
इस भद्रगिरी पर्वत पर कुछ दिन बिताए थे। स्थानीय मान्यता के अनुसार दण्डकारण्य के आकाश में रावण और जटायु के बीच युद्ध हुआ
था,
और दण्डकारण्य में जटायु का कुछ भाग गिर गया था। ऐसा माना जाता है कि यह दुनिया में जटायु का एकमात्र मंदिर है।

10.पंचवटी नासिक :

दंडकारण्य में ऋषियों के आश्रम में रहने के बाद श्री राम अगस्त्य मुनि
के आश्रम गए।
यह आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में स्थित है जो गोदावरी नदी के तट पर स्थित है।
यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काट दी थी। राम और लक्ष्मण ने खर और दूषण से युद्ध किया।
श्रीराम की मित्रता गिद्ध जटायु से भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड में पंचवटी का सुन्दर वर्णन मिलता है।

11.सर्वतीर्थ :

रावण ने नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर और दूषण की हत्या के बाद ही सीता का हरण किया था।
किया और जटायु को भी मार डाला, जिसकी याद नासिक से 56 किमी दूर ताकेड़ गांव में है।
यह आज भी ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर संरक्षित है। सर्वतीर्थ के स्थान पर जटायु की मृत्यु
हुई, जो नासिक जिले की इगतपुरी तहसील के टेकेड गांव में स्थित है। इस जगह के लिए
इसे सर्वतीर्थ कहा जाता था क्योंकि यहीं पर मरते हुए जटायु ने सीता के बारे में बात की थी।
रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार किया और अपने पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया।
इस मंदिर में लक्ष्मण रेखा अज भी उपस्थित है।

12.राम का वनवास और सीता हरण :

परनासाला आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटा की दूरी पर स्थित परनाशाला को ‘पंसला’ या ‘पंसला’ भी कहा जाता है।
परनाशाला गोदावरी नदी के किनारे स्थित है। माना जाता है कि यहीं से सीताजी का अपहरण हुआ था।हालांकि कुछ का मानना ​​है कि रावण ने अपना विमान इसी जगह पर उतारा था।
याहीं से रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बैठाया था ।
इसलिए इसे वास्तविक अपहरण का स्थल माना जाता है। यहां है राम-सीता का प्राचीन मंदिर

13.तुंगभद्रा :

सर्वतीर्थ और पर्नशाला के बाद, श्री राम-लक्ष्मण सीता की खोज में तुंगभद्रा और कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुँचे।
वह सीता की खोज में तुंगभद्रा और कावेरी नदी क्षेत्रों में कई स्थानों पर गये।

14.शबरी का आश्रम:

तुंगभद्रा और कावेरी नदियों को पार करते हुए राम और लक्ष्मण सीता की खोज में निकले।
जटायु और कबांध से मिलने के बाद वे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे।
रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी पहुँचे।
आश्रम का भी दौरा किया, जो अब केरल में स्थित है। शबरी जाति से भीलानी थीं और उनका नाम श्रमण था।
‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। हम्पी इसी नदी के तट पर स्थित है।
हम्पी का उल्लेख पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में वानर साम्राज्य किष्किंधा की राजधानी के रूप में मिलता है ।
केरल का प्रसिद्ध ‘सबरीमलय मंदिर’ मंदिर इसी नदी के तट पर स्थित है।

15.ऋष्यमूक पर्वत :

मलय पर्वत और चंदन के जंगलों को पार करते हुए वे ऋष्यमुक पर्वत की ओर बढ़े।
यहाँ वह हनुमान और सुग्रीव से मिले, सीता के आभूषण देखे और श्रीराम ने बाली का वध किया।
वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के पास ऋष्यमूक पर्वत स्थित था।
ऋष्यमूक पर्वत और किष्किंधा शहर हम्पी, जिला बेल्लारी, कर्नाटक में स्थित है।
पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ के नाम से जाना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था।

राम का वनवास जाना :

राम का वनवास

त्रेता युग में रावण का आतंक चरम सीमा पर था,चारों तरफ त्राहिमाम मचा हुआ था। उसने न केवल मनुश्य जाति को अपितु देवताओं को भी परेशान कर रखा था। रावण का घमंड तोडने और सत्य पर विजय पाने हेतु, स्वयं भगवान विष्णु को राम के रूप में अवतरित होना पड़ा।और भगवान राम का वनवास जाना रावण को मारने का कारण मात्र था।