देशभक्त

देशभक्त स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की आवाज ‘अपनी आजादी को हम हर्गिज मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं लेकिन, सर झुका सकते नहीं’।

जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया।

19 दिसंबर 1927 से एक दिन पहले का दिन था, जब गोरखपुर सेण्ट्रल जेल के बड़े फाटक के

सामने अधेड़ आयु की एक महिला और उसका पति जेल के अन्दर जाने के इंतजार में खड़े थे।

उनके चेहरे पर कुछ उदासी छाई हुयी थी और चिंता भी स्पष्ट दिखलाई दे रही थी।

वे इसी सोच में थे कि उन्हें कब जेल के अन्दर जाने की आज्ञा मिलती है।

जेल के अफसर वहाँ आये और उन्होंने पति-पत्नी दोनों को बुलाया।

वो जेल में एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी से मिलने जा रहे थे,

जिस देशभक्त को अगली सुबह फाँसी की सजा दी जाने वाली थी।

फांसी लगने के एक दिन पूर्व

हथकड़ियाँ-बेडियाँ पहने उस स्वतंत्रता सैनिक को वहाँ लाया गया। वह अन्तिम बार अपनी माँ को देख रहे थे।

और सोच रहा थे कि अब मैं आखिरी बार उसे ‘माँ” कहकर पुकार सकूँगा।

उनके मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था।

उस दिन मां को देखकर उस देशभक्त पुजारी की आंखों में आँसू आ गए ।

उस समय उसकी माता ने हृदय पर पत्थर रख जो कहा,

वो विरली माताएं ही कर सकती हैं। उसकी माँ ने दृढ़ता के स्वर में कहा,

“मेरे बेटे, यह तुम क्या कर रहे हो?

देशभक्त मां ने कोंख भी कर दी कुर्वान

मैं तो अपने सपूत को एक महान योद्धा मानती थी,

और सोचती थी कि मेरे बेटे का नाम सुनते ही ब्रिटिश सरकार भय से काँप उठती है।

मुझे यह मालूम नहीं था कि मेरा बेटा मौत से डरता है।

यदि तुम रोते हुए ही मौत का सामना करना चाहते हो

तो तुमने आजादी की लड़ाई में हिस्सा ही क्यों लिया?

उत्तर में उस वीर स्वाधीनता सेनानी ने कहा,

“मां, तुम तो मेरे हृदय को भली-भांति जानती हो। ये आँसू भय के आँसू नहीं हैं।

ये हर्ष के आँसू हैं, तुम जैसी वीर माता को पाने की खुशी के हैं ये आँसू।

मुझे अपनी मृत्यु का तनिक भी दुख नहीं है।

हां, यदि घी को आग के पास लाया जायेगा तो उसका पिघलना स्वाभाविक है।

बस उसी प्राकृतिक सम्बन्ध से दो चार आँसू आ गए।

मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु से बहुत सन्तुष्ट हूं।

उस माता और उसके पुत्र की देशभक्ति और दृढ़ता देखकर जेल के अफसर भी चकित रह गये।

उस वीर माता के वीर पुत्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम था रामप्रसाद ’बिस्मिल‘,

जिन्होंने मातृभूमि की आजादी के लिए सर्वस्व समर्पण कर दिया।

देशभक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की तर्क क्षमता से कांप गयी अंग्रेजी सरकार

बिस्मिल ने चीफ कोर्ट के सामने अंग्रेजी में फैसले के खिलाफ बहस की तो सरकारी वकील बगलें झाँकते नजर आये।

बिस्मिल की इस तर्क क्षमता पर चीफ जस्टिस लुइस शर्टस को उनसे यह पूछना पड़ा “मिस्टर रामप्रसाद!

फ्रॉम व्हिच यूनीवर्सिटी यू हैव टेकेन द डिग्री ऑफ ला?” (राम प्रसाद! तुमने किस विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री ली है?)

इस पर उन्होंने हँस कर कहा था- “एक्सक्यूज मी सर! ए किंगमेकर डजन्ट रिक्वायर ऐनी डिग्री।” (क्षमा करें महोदय! सम्राट बनाने वाले को किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं होती।)

ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी,देशभक्त भारत माता के वीर सपूत रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की जयंती पर सादर नमन।