चित्रकूट


चित्रकूट एक धार्मिक और पर्यटक स्थल है।

भारत का यह स्थान दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों की सीमाओं पर फैला हुआ है।

वैसे तो चित्रकूट उत्तर प्रदेश का एक जिला भी है। जिसका दूसरा नाम कर्वी भी है।

कर्वी चित्रकूट की तहसील भी है। पूर्व में इसका नाम छत्रपति शिवाजी महाराज नगर भी था।

जिसे बाद में बदलकर चित्रकूट कर दिया गया।

इसलिए लोगों को अक्सर चित्रकूट के नाम और सीमांकन पर धोखा हो जाता है।
परंतु एक चित्रकूट भारत का धार्मिक स्थान है।

जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों की सीमाओं में फैला हुआ हैं।

जो श्री राम, सीता, लक्ष्मण की तपस्थली रहा है।
और दूसरा उत्तर प्रदेश का एक जिला है।

चित्रकूट, भारतवर्ष का सबसे चर्चित धार्मिक स्थान और हिन्दुओं की आस्था का केंद्र रहा है।

और तुलसीदास कृत रामचरितमानस के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम को जब बारह वर्ष का वनवास दिया गया।

तब दशरथ पुत्र राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन-वन भटकते हुए आकर,

चित्रकूट के जंगल में बस गए थे।

हालांकि चित्रकूट का स्थान राम के बसने के पूर्व से ही ऋषि मुनियों की तपस्या का केंद्र रहा है।

माता अनुसूया और अत्रि मुनि ने पहले से ही यहां अपना आश्रम बना रखा था।

जिनके दर्शन करने के उपरांत श्री राम भी उनसे आज्ञा पाकर यहीं चित्रकूट में आकर बस गए थे।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने देवी सीता और लक्ष्मण के साथ अपने वनवास के ग्यारह वर्ष यहीं बिताए थे।

चित्रकूट नाम का महत्व

दरअसल, चित्रकूट- चित्र और कूट दो शब्दों के मेल से बना है।

संस्कृत में चित्र का अर्थ है अशोक और कूट का अर्थ है शिखर या चोटी।

इस संबंध में कहावत है कि,

अनादि काल में इस वन क्षेत्र में कभी अशोक के वृक्ष बहुतायत में मिलते थे।

इसलिए इसका नाम चित्रकूट पड़ा।

यहां के कुछ संतो द्वारा बताया जाता है कि पहले चित्रकूट का नाम त्रिकूट था।

बाद में श्री राम ने संशोधित कर चित्रकूट कर दिया था।

प्रभु श्री राम की तपस्थली चित्रकूट की महत्ता का वर्णन पुराणों के प्रणेता संत गोस्वामी तुलसीदास,

वेदव्यास, आदिकवि कालिदास आदि ने अपनी कृतियों में किया है।

मंदाकिनी नदी के तट पर बसा चित्रकूट धाम,

प्राचीन काल से ही भारत वर्ष का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक, सांस्कृतिक,पर्यटक स्थल रहा है।

आज भी यहां के एकांत घने वन साधु संतों को तपस्या हेतु आश्रय प्रदान करते हैं।

यहां के कल-कल करते झरने, जंगल, पशु-पक्षी,पहाड़, पवित्र नदी,

चहुं ओर मंत्रमुग्ध करने वाली रामनाम की धुन चित्रकूट को धरती का स्वर्ग बनाती हैं।

चित्रकूट को भारतवर्ष का पांचवा महातीर्थ भी कहा जाता है।

कामदगिरि पर्वतखण्ड
चित्रकूट

कामदगिरि पर्वत श्रेणी एक वलय पर्वत श्रेणी है।

अनादि काल में यह पर्वत श्रेणी दुनिया की सबसे लंबी पर्वत श्रेणी थी।
इसी पर्वत श्रेणी का एक खंड चित्रकूट का कामदगिरि पहाड़ है।

मान्यता है कि त्रेता युग में दशरथ पुत्र राम उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण,

इसी पहाड़ की तलहटी पर वनवास के दौरान निवास करते थे।

उनके इस पर्वत पर निवास का मुख्य कारण है कि,

वह घने अशोक के वृक्षों और जंगली जानवरों का संग्रह केंद्र था।

और यह पर्वत माला अपनी ऊंची चोटियों एवं लम्बी श्रंखला के लिए विख्यात थी।

जो सुरक्षा के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण थी।
इस पवित्र पर्वत का हिंदू धर्म में बहुत महत्व है।

श्रद्धालु कामदगिरि पर्वतखण्ड की 5 किलोमीटर की परिक्रमा कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं।

कामतानाथ स्वामी चित्रकूट

जंगलों से घिरे इस पर्वत के तल पर अनेक मंदिर बने हुए हैं।

चित्रकूट के सर्वाधिक लोकप्रिय कामतानाथ और भरत मिलाप मंदिर भी यहीं स्थित है।

5 किलोमीटर के क्षेत्रफल में कामदगिरि पर्वत फैला है।

चहुंओर तलहटी पर भगवान राम और भगवान शंकर के दर्शनार्थ चार द्वार बनाए गए हैं।

मान्यता है कि इन चारों द्वारों का निर्माण त्रेता युग में ही करवा दिया गया था।

जगह-जगह पर राम, लक्ष्मण की झाकियां सजाई गई हैं।

चित्रकूट

कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा,और भगवान राम,भगवान शंकर के दर्शन हेतु देश-विदेश से पर्यटकों का तांता लगा रहता है।
महीने की हर अमावस्या पर यहां मेला लगता है।

और ऐसी श्रुति भी है कि इस दिन श्री राम अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

और भगवान शंकर की उपासना के लिए हर माह की अमावस्या में चित्रकूट अवश्य पधारते हैं।

इसलिए अमावस्या में लाखों की तादाद में श्रद्धालु चित्रकूट पहुंते हैं।

गंगा कही जाने वाली मां मंदाकिनी (पयश्वनी) नदी में स्नान कर मत्यगजेंद्र नाथ स्वामी की मूर्ति पर दूध और जल व पुष्प अर्पण करते हैं।

तत्पश्चात कामतानाथ स्वामी की पांच किलोमीटर की परिक्रमा कर पुन्य फल प्राप्त करते हैं।

चित्रकूट की धार्मिक व दुग्ध नदी
चित्रकूट

मंदाकिनी चित्रकूट की एक प्राचीन धार्मिक नदी है। चित्रकूट परिक्षेत्र में इस पवित्र नदी को गंगा भी पुकारा जाता है।

अनुसूया आश्रम से निकलती कंचन जल की धारा अनवरत इस नदी को चलायमान बनाए रखती है।
ऐसी मान्यता है कि श्री राम अपनी पत्नी सीता और लक्ष्मण के साथ,

प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में मंदाकिनी नदी पर रामघाट में स्नान करने जाते थे।

और जब श्री राम नदी में स्नान करने जाते थे तो नदी में दूध की धारा बहने लगती थी।

जिसके कारण मंदाकिनी को पयश्वनी भी कहा जाता है। तीर्थराज प्रयाग ने मंदाकिनी नदी का नाम पयश्वनी रखा था।

क्षेत्रीय निवासी प्रतिदिन इस नदी में स्नान कर अपने पाप धुलते हैं।

प्राचीन रामघाट चित्रकूट

मंदाकिनी नदी के तट बना राम घाट सबसे प्राचीन घाट है ।

जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर आता है।

यहीं पर प्रभु श्री राम नित्य स्नान किया करते थे l इसी घाट पर राम भरत मिलाप मंदिर है।

और इसी घाट पर गोस्वामी तुलसीदास जी की भब्य मुर्ति प्रतिस्थापित है l

मंदाकिनी नदी के तट पर बने रामघाट में अनेक धार्मिक क्रियाकलाप चलते रहते हैं।

घाट में भगवा वस्त्र धारण किए साधु-सन्तों द्वारा भजन और अखण्ड कीर्तन सुनकर मन को बहुत शांति मिलती है।

प्रतिदिन शायंकालीन होने वाली यहां की भब्य आरती पर्यटकों के मन को लुभाती है।

सभी जगह बजने वाली राम नाम की मीठी धुन से मन को बहुत शान्ति मिलती है।

मत्यगजेंद्र नाथ स्वामी चित्रकूट

मंदाकिनी नदी के तट पर ही रामघाट में एक छोटी सी पहाड़ी है।

के ऊपर भगवान शंकर का भव्य प्राचीन मंदिर बना हुआ है।

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में स्थित शंकर जी की मूर्ति की स्थापना स्वयं त्रेता युग में श्री राम ने की थी।

ताकि प्रतिदिन स्नान करने के पश्चात वह स्वयं भगवान शंकर की उपासना कर सकें।

इसलिए ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व के चलते प्रतिदिन यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।

जानकीकुण्ड चित्रकूट
चित्रकूट

रामघाट से दक्षिण दिशा की तरफ महज तीन किलोमीटर की दूरी पर

मंदाकिनी नदी के किनारे जानकी कुण्ड नामक स्थान है।

राजा जनक की पुत्री होने के कारण सीता को जानकी नाम से पुकारा जाता था।

और माना जाता है कि जानकी यहां प्रतिदिन स्नान करनें आती थीं।

इसलिए इस स्थान को जानकी कुण्ड नाम दिया गया।

समीप में ही राम जानकी मंदिर, रघुवीर मंदिर और संकट मोचन मंदिर बने हुए हैं।

जहां के दर्शन भ्रमण हेतु लोग यहां बहुतायत में आते रहते हैं।

श्फटिक शिला चित्रकूट

जानकी कुण्ड से कुछ दूरी पर मंदाकिनी नदी के किनारे ही यह बहुत पुरानी शिला स्थित है।

माना जाता है कि इस शिला पर सीता के पैरों के मुद्रित निशान आज भी देखे जा सकते हैं।

श्री राम और सीता का यह विहार स्थल था।

नदी के दोनों तरफ घने जंगल और वन्य जीवों की आज भी भरमार है।

जो आज भी श्रद्धालुओं को अपनी तरफ आकृष्ट करता है।

एक बार जब सीता जी इस शिला पर खड़ी थीं,

तो जयंत ने काक रूप धारण कर उन्हें चोंच मारी थी।

इस शिला पर राम और सीता बैठकर चित्रकूट की मनमोहक सुन्दरता निहारा करते थे।

अनुसूया आश्रम चित्रकूट

स्फटिक शिला से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर मध्य प्रदेश की सीमा में

जंगली जानवरों से युक्त घने जंगल के बीच में यह एकान्त आश्रम स्थित है।

इस प्राचीन आश्रम में अत्रि मुनी, अनुसुइया, दत्तात्रेय और दुर्वासा मुनि की प्रतिमाएं स्थापित हैं।

इस आश्रम के अलावा भी साधुओं ने अनेक आश्रम बना रखे हैं।

जहां पर ढेरों साधु-संत,तपश्वी सन्यास आश्रम ब्यतीत करते हुए भजन-पूजन, जप-तप करते नजर आते हैं।

गुप्त गोदावरी गुफा चित्रकूट

यह चित्रकूट नगर से सोलह किलोमीटर की दूरी पर मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है।

गुप्त गोदावरी नामक स्थान भी बहुत प्राचीनतम स्थान है।

यहां दो गुफाएं हैं। एक गुफा चौड़ी और ऊंची है।

प्रवेश द्वार बेहद संकरा होने के कारण इसमें आसानी से नहीं घुसा जा सकता है।

गुफा के अंत में एक छोटा उथला तालाब है जिसे गोदावरी कहा जाता है।

दूसरी गुफा लंबी और संकरी है जिससे हमेशा पानी बहता रहता है।

और यहां पानी में सर्प तैरते रहते हैं। जिसका दृष्य काफी भयानक प्रतीत होता है।

परंतु लोग आज भी इस गुफा में घूमने जाते हैं और लोगों को सर्प काटते नहीं हैं।

कहा जाता है कि इस गुफा के अंत में श्री राम और भैया लक्ष्मण ने अपना दरबार लगाया था।

जिसके कारण इन गुफाओं से लोगों की आस्था जुडी़ हुई है।

लक्ष्मण पहाड़ी चित्रकूट

मध्य प्रदेश की सीमा पर परिक्रमा मार्ग से दक्षिण दिशा की ओर,

एक किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्मण पहाडी स्थित है।

ऐसी मान्यता है कि यहां पर लक्ष्मण जी निवास किया करते थे।

और इस ऊंची पहाड़ी में बैठकर वह अपने भैया श्री राम और भाभी सीता की सुरक्षा व्यवस्था देखते थे।

क्योंकि इस ऊंची पहाड़ी से पूरे चित्रकूट परिक्षेत्र को साफ-साफ दूर-दराज तक देखा जा सकता है।

जब भरत जी माता कैकई से नाराज होकर अपने भैया प्रभु श्रीराम से मिलने चित्रकूट आ रहे थे,

उस समय सर्वप्रथम लक्ष्मण जी ने ही इसी लक्ष्मण पहाड़ी पर बैठे-बैठे भरत जी को आते हुए देखा था।

और प्रभु श्री राम से जाकर बताया था कि भरत चढ़ाई करने के लिए आ रहा है।

और प्रभु श्री राम ने लक्ष्मण की बातें सुनकर लक्ष्मण को समझाया कि भरत चढ़ाई करने के लिए नहीं आया।

हम दोनों भाइयों का प्यार ही भरत को हमारी तरफ खींच लाया है।

और श्री राम दौड़कर भरत से मिलने गए और तुरंत उनको गले से लगाया।
लक्ष्मण पहाड़ी के ऊपर रोप-वे और सीढ़ियों के द्वारा चढ़ा जा सकता है।

हनुमान धारा चित्रकूट

मध्य प्रदेश की सीमा पर पहाड़ी के शिखर पर स्थित हनुमान धारा नामक बेहद पुराना स्थान है।

में हनुमान जी की एक विशाल मूर्ति है।

मूर्ति के सामने तालाब में झरने से पानी गिरता है।

कहा जाता है कि पहाड़ी की धारा को श्रीराम ने लंका दहन से आए हनुमान के आराम के लिए भेंट की थी।

ताकि उनके उनके प्रिय भक्त हनुमान को शीतलता प्राप्त हो सके।

पहाड़ी के शिखर पर ही ‘सीता रसोई’ है। यहां से चित्रकूट का सुन्दर दृष्य देखा जा सकता है।

हनुमान धारा जाने के लिए

रामघाट के नजदीक नयेगांव पुल से सार्वजनिक साधनों व निजी साधनों से जाया जा सकता है।

हनुमान धारा पहाड़ी में ऊपर चढ़ने हेतु सीढी़ और रोप-वे का उपयोग किया जा सकता है।

रामदर्शन चित्रकूट
चित्रकूट

रामदर्शन मध्य प्रदेश पर बनाया गया मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के सम्पूर्ण जीवन चरित्र पर आधारित क्रतिम
कलाक्रतियों का संग्रह स्थल है।

महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्व विद्यालय के ठीक सामने स्थित यह स्थाई प्रदर्शनी बिल्कुल प्राकृतिक ढंग से बनी हुई है।

इसको राष्ट्र ऋषि नानाजी देशमुख ने देश-विदेश के निपुण कारीगरों से बनवाया था।

यहां प्रदर्शनी देखने वालों को ऐसा प्रतीत होता है,

जैसे कि वह प्रभु श्री राम के नगर में विचरण कर रहे हों।

बहरा के हनुमान जी

चित्रकूट के साधु-संतों द्वारा बताया जाता है कि

त्रेता युग में भगवान श्री राम के बनवास पूर्ण करने के पश्चात अयोध्या चले गये।

क्षेत्रीय निवासियों ने राम के अनन्य भक्त

श्री हनुमान की प्रतिमा का अनावरण कामदगिरि पर्वत के तल में परिक्रमा मार्ग पर किया था।

कालांतर में वह प्रतिमा जमीन के नीचे दब गई।

परंतु कलयुग में कामदगिरि पर्वत शिखर से निकली,

पानी की धार ने मिट्टी को काटकर हनुमान जी की प्रतिमा को पुनः उजागर कर दिया।

और साधु-संतों ने वहां पर मंदिर का निर्माण करवा दिया।

और इस स्थान का नाम ‘बहरा के हनुमान’ रख दिया गया।

भरतकूप

रामचरितमानस महाकाव्य के अनुसार –

श्री राम को 14 वर्ष का वनवास मिलने की बात सुनकर भरत अपनी माता कैकेई से बहुत नाराज हुए।

और राजतिलक करवाने से मना कर दिया।

अपने मन में भैया श्री राम का राज्याभिषेक करने की भावना से अयोध्या वासियों के साथ आए थे।

और भरत समस्त तीर्थों का जल भी संग्रहित कर लाए थे।

परंतु श्री राम ने अपने प्रँण को ऑन पर रखकर भरत को स्वयं राज्य संभालने के लिए कहा।

अत्रि मुनि के परामर्श पर भरत ने जल एक कूप में रख दिया था।
भगवान राम को समर्पित यहां एक मंदिर भी है। भगवान राम 14 वर्ष वनवास के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थे।

इस पर भरत काफी दुखी हुये और अपने साथ लाये समस्त तीर्थों के जल को वहीं के कुए में डाल दिया।

केवल अपने साथ भगवान राम की खड़ाऊँ लेकर वापस चले गए। तभी से इस स्थल का नाम भरतकूप पड़ा।

धारकुण्डी आश्रम
चित्रकूट

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बना यह आश्रम प्रकृति का सजीव चित्रण है।

जंगली जानवरों और फल-फूल युक्त घनघोर जंगल, पहाड़, झरने,तालाब प्राकृतिक गुफाऐं,मांद इस स्थान को धरती का स्वर्ग बना देती है।

इस आश्रम में व्यापक मात्रा में साधु बड़े संयम-नियम से रहते हैं।

आश्रम के अनुपम सौन्दर्य का राज साधुओं द्वारा अनुशासन पूर्वक प्रकृति के नियमों का पालन करना है।

प्राचीन गुरुकुल की भांति आश्रम का संचालन किया जाता है।

आश्रम के पास स्वयं के खेत, कृषि यंत्र, मशीनरी, विद्युत गौशाला,भोजन आदि की उपलब्धता है।

यहां पर बिना सीताराम नाम जप के भोजन नहीं दिया जाता है।

साधुओं को श्रेणी में विभाजित किया गया है।

जिनमें मजदूर, मकान बनाने वाले कारीगर, किसान, विद्युत सुधारक, मशीन चालक, सफाई कर्मी, माली आदि सभी अपने-अपने कार्यों में माहिर हैं।

चित्रकूट आने वाने सैलानियों के लिए यह स्थान वास्तव में प्रकृति का सुंदर नमूना है।

राजापुर चित्रकूट

चित्रकूट

राजापुर नामक स्थान चित्रकूट जिले की एक तहसील है।

यह नगर यमुना नदी के तट पर बसाया गया है।

1532 ईस्वी में जन्में तुलसी दास नाम के एक महान संत हुए।

जिनकी मृत्यु 1623 ईस्वी में हुई।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली, हनुमान चालीसा, वैराग्य सन्दीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, इत्यादि रचनाऐं की।

जिनके माध्यम से समाज को धार्मिक ज्ञान प्रदान किया।

जिनमें रामचरितमानस को सम्पूर्ण विश्व ने महाकाव्य के रूप में स्वीकार किया।

तुलसीदास का जन्म

इतिहासकार बताते हैं कि तुलसीदास राजापुर (तत्कालीन गांव ) में ही पैदा हुए थे।

कुछ लोग शोरो उत्तर प्रदेश को भी इनका जन्म स्थान बताते हैं।

प्रचलित जनश्रुति के अनुसार तुलसीदास बारह महीने तक माँ के गर्भ में रहे।

जिसके कारण अत्यधिक हृष्ट पुष्ट पैदा हुए थे।

और उसके मुख में दाँत दिखायी दे रहे थे। जन्म लेने के समय ही उन्होने राम नाम का उच्चारण किया।

जिससे उसका नाम रामबोला पड़ गया। राजापुर में जन्म का प्रमाण देते हुए इतिहासकार बताते हैं।

कि उनके द्वारा लिखित महाकाव्य रामचरितमानस की मूल प्रति वहीं रखी है।

राजापुर चित्रकूट
राजापुर चित्रकूट

और तुलसीदास से जुड़ी तमाम वस्तुवें आज भी राजापुर में सुरक्षित रखी हुई है।

जिसको देखने के लिए दुनिया भर से लोगों की भीड़ यहां लगी रहती है।

यहां के क्षेत्रीय संतो द्वारा भी तुलसीदास का जन्म राजापुर ही बताया जाता है। तुलसी दास को गोस्वामी, अभिनववाल्मीकि के खिताब से सम्मानित किया गया था।

अस्तु इनको लोग सम्मान से गोस्वामी तुलसीदास भी पुकारते हैं।

इस महान संत का जन्म का नाता राजापुर से जुड़ा हुआ है।

राजापुर जन्मस्थान होने के कारण चित्रकूट को और भी महत्वशाली बना देता है।

वायु मार्ग

चित्रकूट का नजदीकी हवाई अड्डा प्रयागराज 130 किलोमीटर दूर है।

और खजुराहो चित्रकूट से 180 किलोमीटर दूर है।

प्रयागराज और खजुराहो से चित्रकूट के लिए प्रतिदिन बस सेवा उपलब्ध है।

चित्रकूट में भी हवाई पट्टी निर्माणाधीन है। जो 2022 तक बनकर तैयार हो जाएगी।

तत्पश्चात उड़ाने भी शुरू हो जाएंगी।

रेल मार्ग

चित्रकूट से 8 किलोमीटर की दूरी पर कर्वी और 5 किलोमीटर पर शिवरामपुर रेलवे स्टेशन है।

प्रयागराज, जबलपुर,बांदा, दिल्ली, झांसी, हावड़ा, आगरा,मथुरा, लखनऊ, कानपुर,ग्वालियर,

झांसी,रायपुर, कटनी, मुगलसराय,वाराणसी बांदा आदि शहरों के लिए यहां से रेल गाड़ियां उपलब्ध हैं।

25 किलोमीटर की दूरी पर मानिकपुर रेलवे स्टेशन (जंक्शन) स्थित है।

जहां से पूरे देश के लिए रेल गाड़ियां उपलब्ध है।

सड़क मार्ग

चित्रकूट सतना बस अड्डा से छतरपुर, सतना, रीवा, मैहर,पन्ना, छतरपुर आदि के लिए बस सेवाएं चल रही हैं।

चित्रकूट से कर्वी बस अड्डा 10 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

कर्वी बस अड्डे से बांदा, प्रयागराज, प्रतापगढ़, बनारस, अयोध्या, कानपुर, लखनऊ,पन्ना, सागर आदि शहरों के लिए नियमित बस सेवाएं हैं।

दिल्ली के लिए भी कर्वी से बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

कर्वी से चित्रकूट जाने के लिए अनेक प्रकार के साधन उपलब्ध हैं।

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